Friday, June 26, 2020

एंटी डंपिंग ड्यूटी



 "डंपिंग" का मतलब किसी भी प्रकार के अत्याधिक कम मूल्य निर्धारण से है।आम तौर पर यह शब्द अब केवल अंतर्राष्ट्रीय व्यापार कानून के संदर्भ में ही प्रयोग किया जाता है।

चर्चा में क्यों?

● हाल ही में वित्त मंत्रालय ने दक्षिण कोरिया और थाईलैंड से आयात होने वाले शुद्ध PTA (Pure Terephthalic Acid) पर एंटी-डंपिंग शुल्क लगाया है।

डंपिंग क्या है?

● किसी देश द्वारा दूसरे मुल्क में अपने उत्पादों को लागत से भी कम दाम पर बेचने को डंपिंग कहा जाता है।

एंटी डंपिंग ड्यूटी / डंपिंग ड्यूटी क्यों अध्यारोपित की जाती है?

● इससे घरेलू उद्योगों का सामान महंगा पड़ने के कारण वे बाजार में पिट जाते हैं।
● सरकार इसे रोकने के लिए निर्यातक देश में उत्पाद की लागत और अपने यहां मूल्य के अंतर के बराबर शुल्क लगा देती है। इसे ही डंपिंगरोधी शुल्क यानी एंटी डंपिंग ड्यूटी कहा जाता है।

क्या? होता हैं इस प्रक्रिया में!

● विश्व व्यापार को खोलने के उद्देश्य से विश्व व्यापार संगठन के सदस्य देशों के बीच एक समझौता हुआ जिसके अधीन सदस्य देश अपना माल एक दूसरे के यहां निर्यात कर सकें।
● इसके लिए अनुकूल सुविधाएं प्रदान करना, कस्टम ड्यूटी कम करना और प्रतिबंध हटाना शामिल था। लेकिन उदारीकरण के साथ-साथ कुछ शर्तें भी तय की गईं जिससे कोई देश इसका नाजायज़ फ़ायदा न उठा सके।
● अगर एक देश के किसी उत्पाद की क़ीमत 100 रुपए है तो वह उसी क़ीमत पर दूसरे देश को निर्यात कर सकता।
● अगर वह 70 या 80 रुपए में उसे निर्यात करेगा तो उसपर आयात करने वाले देश की सरकार ऐंटी डंपिंग ड्यूटी लगा सकती है।
● जिससे देश की उन इकाइयों को नुक़सान न हो जो उस तरह का माल तैयार कर रही हैं।


प्रमुख बिंदु

● वाणिज्य मंत्रालय में नियुक्त अधिकारी द्वारा सनसेट समीक्षा के आधार पर की गई सिफारिशों को लागू करते हुए राजस्व विभाग ने PTA पर 27.32 डॉलर प्रति टन एंटी-डंपिंग शुल्क लगाया गया है।
● PTA पॉलिएस्टर चिप्स के निर्माण प्रयोग होने वाला प्राथमिक कच्चा माल है जो कपड़े, पैकेजिंग, साज-सामान, उपभोक्ता वस्तुओं, रेज़िन और कोटिंग आदि में प्रयोग किया जाता है।


जलवायु परिवर्तन, ग्रीष्म लहर और वनाग्नि



■ दोस्तों ग्लोबल वार्मिंग एक वैश्विक समस्या बन चुकी है। देश विदेश के लोग इस मुद्दे पर जागरूक हो रहे हैं।

■ दोस्तों उबलते पानी के मेंढक की कहानी के बारे में सबने सुना होगा, उबलते पानी में एक मेंढक ऐसे कूदता है मानो वह पानी से कूदकर स्वयं को बचा लेगा, लेकिन वह मेंढक जो पानी में है, वह धीरे-धीरे गर्म हो जाता है और अंत में उसकी मौत हो जाती है। वैश्विक ऊष्मन अर्थात् ग्लोबल वार्मिंग का संकट भी हमें इसी तरह दिनों-दिन घेरता जा रहा है ऐसे में यह आवश्यक हो गया है कि हम स्वयं को सुरक्षित रखने के लिये महत्त्वपूर्ण कदम उठाएँ।

ग्लोबल वार्मिंग का अर्थ

● पर्यावरण में बढ़ता तापमान। सूर्य की गर्मी से धरती लगातार गर्म हो रही है और इसका मुख्य कारण है पर्यावरण में कार्बन डाईआक्साईड की मात्रा में वृद्धि।
● इस कार्बन डाईआक्साईड के स्तर के बढ़ने का मुख्य कारण है, धरती पर घटती पेड़ों की संख्या जो कि हवा को शुद्ध करने का कार्य करते हैं।
● बढ़ते तापमान के कारण धरती पर मौसम में अत्यधिक परिवर्तन, कहीं बाढ़ तो कहीं तूफान, फसलों को नुकसान के कारण खाद्य सामग्री में कमी व कई प्रकार की बीमारियाँ बढ़ रही हैं।
● इन सबसे निपटने के लिए हमें अपने पर्यावरण को स्वच्छ रखने की आवश्यकता है।

● ग्लोबल वार्मिंग जिसे सामान्य भाषा मे, भूमंडलीय तापमान मे वृद्धि कहा जाता है|
● पृथ्वी पर आक्सीजन की मात्रा ज्यादा होनी चाहिये परन्तु, बढ़ते प्रदुषण के साथ कार्बनडाईआक्साइड की मात्रा बढ़ रही है|
● जिसके चलते ओजोन पर्त मे एक छिद्र हो चूका है|
● वही पराबैगनी किरणें सीधे पृथ्वी पर आती है, जिसका असर ग्रीनहाउस पर पड़ रहा है|
● अत्यधिक गर्मी बढ़ने लगी है, जिसके कारण अंटार्कटिका मे बर्फ पिघल रही है जिससे, जल स्तर मे बढोतरी हो रही है|
● रेगिस्तान मे बढ़ती गर्मी के साथ रेत का क्षेत्रफल बढ़ रहा है|

ग्रीनहाउस के असंतुलन के कारण ही ग्लोबल वार्मिंग हो रही है|

■ ग्रीनहाउस क्या है?

● सभी प्रकार की गैसों से, जिनका अपना एक प्रतिशत होता है, उन गैसों से बना ऐसा आवरण जोकि, पृथ्वी पर सुरक्षा पर्त की तरह काम करता है|
● जिसके असंतुलित होते ही, ग्लोबल वार्मिंग जैसी भीषण समस्या सामने आती है|


वर्तमान स्थिति

15 जनवरी 2020 को विश्व मौसम विज्ञान संगठन (World Meteorological Organization) के प्रमुख अंतर्राष्ट्रीय डेटासेट के समेकित विश्लेषण के अनुसार, संगठन ने पुष्टि की कि वर्ष 2016 के बाद वर्ष 2019 दशक का दूसरा सबसे गर्म वर्ष रहा।

औसत तापमान

● पाँच वर्ष (2015-2019) और दस वर्ष (2010-2019) के लिये औसत तापमान रिकॉर्ड स्तर पर काफी अधिक रहा।
● 1980 के दशक से हर एक दशक पिछले दशक की तुलना में गर्म रहा है।
● इस प्रवृत्ति के आगे भी जारी रहने की उम्मीद है क्योंकि वायुमंडल में ऊष्मा को रोकने वाली ग्रीनहाउस गैसों के रिकॉर्ड स्तर के कारण पृथ्वी की जलवायु में परिवर्तन आ रहा है।
● इस समेकित विश्लेषण में इस्तेमाल किये गए पाँच डेटा सेटों के अनुमान के अनुसार, वर्ष 2019 में वार्षिक वैश्विक तापमान वर्ष 1850-1900 के औसत तापमान से 1.1 डिग्री सेल्सियस अधिक रहा, जिसका उपयोग पूर्व-औद्योगिक परिस्थितियों का प्रतिनिधित्व करने के लिये किया जाता था।
● वर्ष 2016 एक मज़बूत अल नीनो (El Niño) के कारण रिकॉर्ड स्तर पर सबसे गर्म वर्ष रहा है, जिससे ऊष्मन और दीर्घकालिक जलवायु परिवर्तन प्रभाव अधिक होता है।
● वर्ष 2019 में जुलाई माह को यूरोप में सबसे गर्म माह के रूप दर्ज किया गया (जब से वर्ष के तापमान के विषय में रिकॉर्ड दर्ज किया जा रहा है, तब से अभी तक का सबसे गर्म माह), इसके चलते बहुत-से लोगों की मौत हो गई, दफ्तरों के साथ-साथ कई आवश्यक सेवाओं को भी बंद रखा गया।

प्रभाव

● तपती गर्मी ने न केवल पूरे गोलार्द्ध के मौसम में परिवर्तन किया, बल्कि ऑस्ट्रेलिया में अभी तक के सबसे गर्म एवं शुष्क वर्ष के रूप में दर्ज किये गए वर्ष 2019 ने वनाग्नि जैसी खतरनाक स्थिति को भी जन्म दिया जिसकी व्यापकता एवं भयावता ने संपूर्ण विश्व को झकझोर कर रख दिया।
● अत्यधिक तापमान, ग्रीष्म लहर या हीटवेव और रिकॉर्ड स्तर पर सूखे की स्थिति कोई विसंगतियाँ नहीं हैं बल्कि ये सभी एक बदलती जलवायु की व्यापक प्रवृत्तियाँ हैं।
● यदि वैश्विक तापमान में और अधिक वृद्धि होती है तो इससे उत्पन्न होने वाले प्रभावों की भयावहता की कल्पना अतिशयोक्ति नहीं होगी।



3.2 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि

● UNEP की उत्सर्जन गैप रिपोर्ट 2019 के अनुसार, कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन के मौजूदा स्तर पर, यदि हम केवल पेरिस समझौते की वर्तमान जलवायु प्रतिबद्धताओं पर निर्भर करते हैं और उन्हें पूरी तरह से लागू करते हैं, तो 66 प्रतिशत संभावना यह है कि सदी के अंत तक वैश्विक ऊष्मन में 3.2 डिग्री सेल्सियस तक की वृद्धि होगी।

क्या किया जा सकता है?
सरकार, कंपनियाँ, उद्योग और जी20 देशों की जनता, जो ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन के 78 प्रतिशत के लिये ज़िम्मेदार हैं, के डीकार्बोनाइज़ेशन (अर्थात् किसी पदार्थ से कार्बन या कार्बनिक अम्‍ल को अलग करना) के लिये सटीक लक्ष्य और समयसीमा तय की जानी चाहिये ताकि इस दिशा में प्रभावी कार्यवाही संभव हो सके।
● इसके अतिरिक्त दक्ष प्रौद्योगिकियों, स्मार्ट खाद्य प्रणालियों और शून्य-उत्सर्जन क्षमता तथा अक्षय ऊर्जा से संचालित इमारतों को विकसित करना चाहिये, साथ ही इसी के अनुरूप अन्य विकल्प अथवा उपाय अपनाने चाहिये ताकि आने वाली पीढ़ी के अस्तित्व को सुरक्षित रखा जा सके।
● वर्ष 2020 में विश्व जलवायु परिवर्तन से संबंधित अपनी प्रतिबद्धताओं को पूर्ण करने की दिशा में प्रभावी कार्यवाही सुनिश्चित कर सकता है।
● यह एक ऐसा वर्ष है जब वैश्विक तापमान में 1.5 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि को सीमित करने के लिये वैश्विक उत्सर्जन में 7.6 प्रतिशत की कटौती करने की आवश्यकता है, वर्ष 2030 तक इसमें प्रत्येक वर्ष 7.6 प्रतिशत की गिरावट आनी चाहिये।
● इससे पहले की वर्ष 2020 में चरम मौसमी घटनाएँ समुदायों और पारिस्थितिक तंत्रों पर उनकी क्षमता से अधिक दबाव बनाए, एक वैश्विक समुदाय के रूप में हमारे पास पृथ्वी को मेंढक की तरह उबलने से बचाने के लिये पर्याप्त साधन और अवसर मौजूद हैं, लेकिन अब समय केवल नीतियाँ बनाने का नहीं है, बल्कि उनका प्रभावी क्रियान्वयन करने का है, इसकी और अधिक अनदेखी का परिणाम कितना भयावह हो सकता है इसकी कल्पना ऑस्ट्रेलियाई वनाग्नि से की जा सकती है।



ग्लोबल वार्मिंग क्यों हो रही है? 

● ग्लोबल वार्मिंग का सबसे बड़ा कारण प्रदुषण है|
● आज के समय के अनुसार, प्रदुषण और उसके प्रकार बताना व्यर्थ है|
● हर जगह और  क्षेत्र मे यह बढ़ रहा है, जिससे कार्बनडाईआक्साइड की मात्रा बढ़ रही है|
● जिसके चलते ग्लोबल वार्मिंग बढ़ रही है|
● आधुनिकीकरण के कारण, पेड़ो की कटाई गावों का शहरीकरण मे बदलाव|
● हर खाली जगह पर बिल्डिंग,कारखाना, या अन्य कोई कमाई के स्त्रोत खोले जा रहे है| खुली और ताजी हवा या
● आक्सीजन के लिये कोई स्त्रोत नही छोड़े| अपनी सुविधा के लिए, प्राचीन नदियों के जल की दिशा बदल देना|
● जिससे उस नदी का प्रवाह कम होते-होते वह नदी स्वत: ही बंद हो जाती है|
● गिनाने के लिये और भी कई कारण है| पृथ्वी पर हर चीज़ का एक चक्र चलता है|
● हर चीज़ एक दूसरे से, कही ना कही, किसी ना किसी, रूप मे जुडी रहती है|
● एक चीज़ के हिलते ही पृथ्वी का पूरा चक्र हिल जाता है| जिसके कारण भारी हानि का सामना करना पड़ता है|



ग्लोबल वार्मिंग का प्रभाव

● जिस तरह प्राक्रतिक आपदा का प्रभाव पड़ता है| उससे भारी नुकसान उठाना पड़ता है|
● बिल्कुल उसी तरह, ग्लोबल वार्मिंग एक ऐसी आपदा है, जिसका प्रभाव बहुत धीरे-धीरे होता है|
● यह बहुत ही महत्वपूर्ण बात है कि, दूसरी आपदाओं की भरपाई तो कई सालो हो सकती है|
● लेकिन ग्लोबल वार्मिंग से हो रहे, नुकसान की भरपाई मनुष्य अपनी अंतिम सास तक नही कर सकता|
जैसे –
● ग्लोबल वार्मिंग के चलते, कई पशु-पक्षी व जीव-जंतुओं की प्रजाति ही विलुप्त हो चुकी है|
● बहुत ठंडी जगह जहाँ, बारह महीनों बर्फ की चादर ढकी रहती थी|
● वहां बर्फ पिघलने लगी जिससे, जल स्तर मे वृद्धि होने लगी है|
भीषण गर्मी के कारण रेगिस्तान का विस्तार होने लगा है|
● जिससे आने वाले वर्षो मे, और अधिक गर्मी बढ़ने की संभावना है|
● पृथ्वी पर मौसम के असंतुलन के कारण चाहे जब अति वर्षा, गर्मी, व ठण्ड पड़ने लगी है या सुखा रहने लगा है|
● जिसका सबसे बड़ा असर फसलो पर पड़ रहा है जिससे, पूरा देश आज की तारीख मे महंगाई से लड़ रहा है|
● ग्लोबल वार्मिंग से पर्यावरण पर सबसे ज्यादा नुकसान हो रहा है| जिससे कोई भी व्यक्ति छोटे से लेकर बड़े तक किसी ना किसी बीमारी से ग्रस्त है|
● शुद्ध आक्सीजन न मिलने के कारण व्यक्ति घुटन की जिंदगी जीने लगा है|

ग्लोबल वार्मिंग के निराकरण 

● ग्लोबल वार्मिंग के लिये बहुत आवश्यक है, “पर्यावरण बचाओ, पृथ्वी बचेगी|” बहुत ही छोटे-छोटे दैनिक जीवन मे, हो रहे कार्यो मे बदलाव को सही दिशा मे ले जाकर, इस समस्या को सुलझाया जा सकता है|
● पेड़ो की अधिक से अधिक मात्रा मे मौसम के अनुसार लगाये|
● लंबी यात्रा के लिये कार की बजाय ट्रेन का उपयोग करे|
● दैनिक जीवन मे जहा तक संभव हो सके, दुपहिया वाहनों की बजाय, सार्वजनिक बसों या यातायात के साधनों का उपयोग करे|
● बिजली से चलने वाले साधनों की अपेक्षा, सौर ऊर्जा वाले साधनों का उपयोग करे|
● जल का दुरुपयोग न करे|
● प्राचीन व प्राकृतिक जल संसाधनों का नवीनीकरण ऐसा न करे जिससे वह नष्ट हो जाये|
आधुनिक चीजों के उपयोग को कम कर घरेलु व देशी चीजों का उपयोग करे|


Wednesday, June 24, 2020

भारत में कृषि क्लस्टर



विकासशील देशों के ये किसान कम मार्जिन के "संतुलन के चक्र" (Cycle of Equilibrium) से घिरे हैं जहाँ पर सीमित क्षमता और कम निवेश के चलते कम उत्पादकता, कम बाज़ार उन्मुखीकरण जैसी परिस्थितियाँ व्याप्त हैं। इस चक्र को दीर्घकालीन प्रतिस्पर्द्धा के माध्यम से ही तोड़ा जा सकता है। जिसे साधारण शब्दों में कृषि क्लस्टर कहा जाता हैं।

चर्चा में क्यों?

● भारत सरकार ने कृषि निर्यात नीति-2018 (Agri Export Policy-2018) के तहत आंध्र प्रदेश के अनंतपुर और कडप्पा ज़िलों को केला क्लस्टर के तौर पर अधिसूचित किया है।
● इस परिप्रेक्ष्य में हमने भारत में कृषि क्लस्टर से संबंधित सभी पक्षों का समग्रता से विश्लेषण किया है।

केला क्लस्टर से संबंधित मुख्य बिंदु

● आंध्र प्रदेश सरकार, निर्यातक कंपनी तथा कृषि और प्रसंस्कृत खाद्य उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण इस पहल में एक साथ कार्य करेंगे।
● निर्यातक कंपनी द्वारा केला उत्पादन को बढ़ाने के लिये आंध्र प्रदेश के केला उत्पादकों को विशेषज्ञता एवं आधुनिक तकनीक प्रदान करने के साथ ही उन्हें विशेष रूप से प्रशिक्षित किया जा रहा है।

कृषि और प्रसंस्कृत खाद्य उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण (APEDA)
इसकी स्थापना भारत सरकार द्वारा कृषि और प्रसंस्कृत खाद्य उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण अधिनियम, 1985 के अंतर्गत ‘संसाधित खाद्य निर्यात प्रोत्साहन परिषद’ के स्थान पर की गई थी।
● यह वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय के अधीन कार्य करता है।
इस प्राधिकरण का मुख्यालय नई दिल्ली में है।

क्लस्टर क्या है?
बोसवर्थ और ब्रून के अनुसार, "उद्योगों की भौगोलिक विशेषता जो स्थान विशेष की परिस्थितियों के माध्यम से अधिक लाभ प्राप्त करती है" क्लस्टर कहलाती है।
● क्लस्टर से जुड़े उद्योगों और अन्य संस्थाओं की एक शृंखला होती है जिसमें संबंधित उद्योग घटक, मशीनरी, सेवा और विशेष बुनियादी ढाँचा शामिल होता है।
● क्लस्टर अक्सर चैनलों के माध्यम से ग्राहकों, कंपनियों के साथ-साथ उद्योग विशेष से संबंधित कौशल एवं प्रौद्योगिकियों के मध्य एकीकृत दृष्टिकोण स्थापित करता है।

क्लस्टर आधारित कृषि
● विकासशील देशों में टिकाऊ विकास की सबसे बड़ी संभावना कृषि क्षेत्र में निहित है।
● यहाँ पर गरीबी व्यापक और खराब स्वरूप में विद्यमान है तथा किसान छोटे पैमाने पर सीमित क्षेत्रों में कृषि करते हैं। 
● विकासशील देशों के ये किसान कम मार्जिन के "संतुलन के चक्र" (Cycle of Equilibrium) से घिरे हैं जहाँ पर सीमित क्षमता और कम निवेश के चलते कम उत्पादकता, कम बाज़ार उन्मुखीकरण जैसी परिस्थितियाँ व्याप्त हैं।
● इस चक्र को दीर्घकालीन प्रतिस्पर्द्धा के माध्यम से ही तोड़ा जा सकता है।



भारत में कृषि क्लस्टर

● भारत भौगोलिक, जलवायवीय और मृदा संबंधी विविधता वाले विशाल देशों में से एक है इसीलिये भारत के कृषि स्वरूप में पर्याप्त विविधता है।
● भारत के विभिन्न क्षेत्र किसी विशेष फसल की कृषि के लिये आदर्श स्थल हैं, उदाहरणस्वरूप गुजरात और महाराष्ट्र में कपास संबंधी आदर्श स्थितियाँ हैं।
● इसी प्रकार किसी फसल विशेष के संबंध में भी स्थानीय विविधता है, जैसे- मूँगे की विभिन्न किस्मों के लिये कर्नाटक, झारखंड और असम में विशेष परिस्थितियाँ पाई जाती हैं।
● धान की अमन, ओसों जैसी प्रजातियाँ विभिन्न कृषि क्षेत्रों में बेहतर उत्पादन करती हैं।
● भारत में कृषि अर्थव्यवस्था के क्षेत्रीकरण संबंधी पूर्व अध्ययनों की जाँच करने के बाद योजना आयोग द्वारा यह सिफारिश की गई थी कि कृषि-आयोजन संबंधी नीतियाँ कृषि-जलवायु क्षेत्रों के आधार पर तैयार की जानी चाहिये।
● इसी प्रकार संसाधन विकास के लिये देश को कृषि-जलवायु विशेषताओं, विशेष रूप से तापमान और वर्षा सहित मृदा कोटि, जलवायु एवं जल संसाधन उपलब्धता के आधार पर पंद्रह कृषि जलवायु क्षेत्रों में बाँटा गया है।
● इस प्रकार भारत की कृषि जलवायु विविधता को देखते हुए भारत में क्लस्टर आधारित कृषि की पर्याप्त संभावनाएँ हैं।
● इसी परिप्रेक्ष्य में खाद्य और कृषि संगठन द्वारा महाराष्ट्र में क्लस्टर से संबंधित कई विशेषताओं उनकी प्रतिस्पर्द्धा या उनकी कमी के कारणों की समीक्षा की।

भारत में इस प्रकार की कृषि से संभावनाएँ

● वे देश जो अधिक खाद्यान उत्पादन करते हैं, की अपेक्षा भारत में अधिक कृषि क्षेत्र है परंतु भारत में विस्तृत कृषि की कमी के कारण उत्पादन के अपेक्षित स्तर को प्राप्त नही किया जा सका है।
● हरित क्रांति का प्रभाव भी भारत के सीमित क्षेत्रों को ही लाभान्वित कर पाया है, इसी परिप्रेक्ष्य में भारत में विद्यमान सीमांत एवं छोटी जोत वाले कृषि क्षेत्र के मध्य क्लस्टर आधारित कृषि की असीम संभावनाएँ हैं।
● विभिन्न कृषि क्षेत्रों में आदर्श फसल और उससे संबंधित बुनियादों बातों को ध्यान में रखते हुए विशेष विनियामक रणनीति के माध्यम से कृषको की आय दुगुनी करने संबंधी प्रयोजनों में बेहतर सफलता प्राप्त की जा सकती है।
● इसके अतिरिक्त भारत में कृषकों की खाद्यान से संबंधित कृषि अवधारणा को व्यावसायिक कृषि में बदल कर स्थानीय प्रवास, रोज़गार और स्थानीय व्यवसाय जैसी फारवर्ड एवं बैकवर्ड सुधारों के माध्यम से कृषि पर निर्भर 50% जनसंख्या कि समस्याओं के बेहतर समाधान के साथ-साथ आर्थिक विकास में कृषि की प्रासंगिक भूमिका निभा सकती है क्योंकि भारत अभी भी विकासशील व कृषि प्रधान देश है।

समस्याएँ

● भारत में कृषि परंपरागत दृष्टिकोण के आधार पर खाद्यान आवश्यकताओं की पूर्ति के लिये की है जिसमें कौशल, ज्ञान और नवीन तकनीकों का अभाव देखा जाता है।
● इसके अतिरिक्त कृषकों के समक्ष कृषि एवं फसल संबंधी जानकारियों का अभाव जैसी सामान्य समस्याएँ हैं।
● भारत में अभी भी समर्पित संस्थाओं, कृषि विशेष क्षेत्रों एवं अनुसंधानों तथा इन अनुसंधानों की जानकारी का कृषकों की पहुँच से दूरी जैसे कारक इस क्षेत्र की सफलता में बाधक बने हैं।
● खाद्य और कृषि संगठन द्वारा हाल के वर्षों में चिली और अर्जेंटीना जैसे देशों में इस प्रकार की कृषि के सफल प्रयोग किये हैं।
● इस प्रकार की कृषि के परिणामस्वरूप वहाँ पर कृषि उत्पादन और कृषकों कि आय में बेहतर सुधार देखा गया हैं।

समाधान

● भारत में विभिन्न क्षेत्रों से संबंधित समर्पित शोध संस्थाओं की स्थापना की जानी चाहिये इसके अतिरिक्त पहले से स्थापित संस्थानों के कार्य निष्पादन में अपेक्षित सुधार किया जाना चाहिये।
● इस प्रकार के संस्थानों के शोध के आधार पर पाठ्यक्रम एवं तकनीकी ज्ञान का भी प्रसार किया जाना चाहिये।
● किसी क्षेत्र से संबंधित स्वयं सहायता समूहों (SHG) एवं गैर-सरकारी संगठनों के माध्यम से सामान्य और तकनीकी जानकारी का प्रसार किया जाए इसके अतिरिक्त विभिन्न क्षेत्रों में कार्यशालाओं का आयोजन किया जाना चाहिये।
● क्षेत्र विशेष पर समर्पित एप भी बनाए जाने चाहिये ताकि सभी प्रकार की जानकारियों को अद्यतन किया जा सके। इस प्रकार के एप के परिचालन संबंधी क्रिया-कलापों हेतु ग्राम पंचायत और स्थानीय स्तर पर नियमित कार्यशालाओं का किया जाना चाहिये।
● वित्तीय प्रवाह, अवसंरचना और जागरूकता के साथ-साथ बाज़ार पहुँच जैसी अन्य आवश्यकताओं को पूरा कर भारत अपनी श्रम शक्ति और जनसंख्या का बेहतर प्रयोग अपने आर्थिक एवं मानव विकास के लिये कर सकता है।

कृषि निर्यात नीति- 2018

● कृषि निर्यात नीति, 2018 का उद्देश्य वर्ष 2022 तक कृषि निर्यात को 60 अरब अमेरिकी डॉलर से अधिक करना है।
● कृषि निर्यात नीति से चाय, कॉफी और चावल जैसे कृषि उत्पादों के निर्यात को बढ़ावा मिलने के साथ-साथ यह वैश्विक कृषि व्यापार में देश की हिस्सेदारी को बढ़ाएगी।
● कृषि निर्यात नीति में की गईं सिफारिशों को दो श्रेणियों में व्यवस्थित किया गया है-

सामरिक (Strategic)

सामरिक श्रेणी में तहत निम्नलिखित उपाय शामिल होंगे-

● नीतिगत उपाय
● अवसंरचना एवं रसद समर्थन
● निर्यात को बढ़ावा देने के लिये समग्र दृष्टिकोण
● कृषि निर्यात में राज्य सरकारों की बड़ी भागीदारी
● मूल्य वर्द्धित निर्यात को बढ़ावा देना
● ‘ब्रांड इंडिया’ का विपणन और प्रचार

परिचालन (Operational)

परिचालन के तहत निम्नलिखित कार्य शामिल होंगे-

● उत्पादन और प्रसंस्करण में निजी निवेश को आकर्षित करना
● मज़बूत नियमों की स्थापना
● अनुसंधान एवं विकास
● विविध